समूण
शहर की भागदौड़ में, जहाँ सुबहें चिड़ियों की आवाज़ से नहीं बल्कि अलार्म से शुरू होती हैं, आरव को एक दिन पहाड़ से एक छोटा सा डिब्बा मिला। उस डिब्बे में पहाड़ों की खुशबू थी — पहाड़ी हल्दी, जख्या, मेथी और मिट्टी की वही सोंधी महक। ऊपर सिर्फ एक नाम लिखा था — “समूण।”
उसकी दादी कहा करती थीं, “ समूण सिर्फ एक तोहफ़ा नहीं, पहाड़ का प्यार है… जो अपने लोगों तक पहुँचने का रास्ता ढूंढ ही लेता है।”
उस शाम जब आरव ने अपने छोटे से शहर वाले कमरे में वह डिब्बा खोला, तो अचानक उसे लगा जैसे पहाड़ उसके करीब आ गए हों। उसे बहते झरनों की आवाज़ याद आई, माँ के हाथों का खाना याद आया, और वो शामें… जब पूरा गाँव एक-दूसरे का अपना लगता था।
समूण सिर्फ कुछ पहाड़ी चीज़ों का नाम नहीं था। वो उन लोगों के लिए पहाड़ का एक एहसास था, जो शहरों में रहते हुए भी अपने गाँव को हर दिन थोड़ा-थोड़ा याद करते हैं।




